Thursday, May 7, 2020

सच्चा_सतगुरु_कौन


सच्चा_सतगुरु_कौन
गरीब, राम रटत नहिं ढील कर, हरदम नाम उचार। अमी महारस पीजिये, योह तत बारंबार।।
 हे साधक! पूर्ण गुरू से दीक्षा लेकर उस राम के नाम की रटना (जाप करने में) में देरी
(ढ़ील) ना कर। प्रत्येक श्वांस में उस नाम को उच्चार यानि जाप कर। यह स्मरण का अमृत
बार-बार पी यानि कार्य करते-करते तथा कार्य से समय मिलते ही जाप शुरू कर दे। इस
अमृत रूपी नाम जाप के अमृत को पीता रहे। यह तत यानि भक्ति का सार है।
यदि यथार्थ नाम प्राप्त नहीं है तो चाहे पुराणों में वर्णित धार्मिक क्रियाएँ करोड़ों गाय
दान करो, करोड़ों धर्म यज्ञ, जौनार (जीमनवार = किसी लड़के के जन्म पर भोजन कराना)
करो, चाहे करोड़ों कुँए खनों (खुदवाओ), करोड़ों तीर्थों के तालाबों को गहरा कराओ जिससे
जम मार (काल की चोट) यानि कर्म का दण्ड समाप्त नहीं होगा।

वाणी नं. 22 :-
गरीब,कोटि गऊ जे दान दे, कोटि जग्य जोनार। कोटि कूप तीरथ खने, मिटे नहीं जम मार।

जैसे किसी देव या संत के नाम का मेला लगता है। उसका स्थान किसी छोटे-बड़े
जलाशय के पास होता है। श्रद्धालुओं को उस तालाब से मिट्टी निकलवाने को कहा जाता
है तथा उसको पुण्य का कार्य कहा जाता है। यदि सतनाम का जाप नहीं किया तो मोक्ष नहीं
होगा। साधक को अन्य साधना का फल स्वर्ग में समाप्त करके पाप को नरक में भोगना होता
है। इसलिए सब व्यर्थ है।

वाणी 
गरीब, कोटिक तीरथ ब्रत करी, कोटि गज करी दान। कोटि अश्व बिपरौ दिये, मिटै न खैंचातान।।

चाहे करोड़ों तीर्थों का भ्रमण करो, करोड़ों व्रत रखो, करोड़ों गज (हाथी) दान करो,
चाहे करोड़ों घोड़े विप्रों (ब्राह्मणों) को दान करो। उससे जन्म-मरण तथा कर्म के दण्ड से होने
वाली खेंचातान (दुर्गति) समाप्त नहीं हो सकती।

वाणी
गरीब, पारबती कै उर धर्या, अमर भई क्षण मांहिं। सुकदेव की चौरासी मिटी, निरालंब निज नाम।

 वाणी का भावार्थ है कि जैसे पार्वती पत्नी शिव शंकर को जितना अमरत्व (वह
भगवान शिव जितनी आयु नाम प्राप्ति के बाद जीएगी, फिर दोनों की मृत्यु होगी। इतना
मोक्ष) भी देवी जी को शिव जी को गुरू मानकर निज मंत्रों का जाप करने से प्राप्त हुआ है।
ऋषि वेद व्यास जी के पुत्रा शुकदेव जी को अपनी पूर्व जन्म की सिद्धि का अहंकार था। जिस
कारण से बिना गुरू धारण किए ऊपर के लोकों में सिद्धि से उड़कर चला जाता था। जब
श्री विष्णु जी ने उसे समझाया और स्वर्ग में रहने नहीं दिया, तब उनकी बुद्धि ठिकाने आई।
राजा जनक से दीक्षा ली। तब शुकदेव जी की उतनी मुक्ति हुई, जितनी मुक्ति उस नाम
से हो सकती थी। परमेश्वर कबीर जी अपने विधान अनुसार राजा जनक को भी त्रोतायुग
में मिले थे। उनको केवल हरियं नाम जाप करने को दिया था क्योंकि वे श्री विष्णु जी के
भक्त थे। वही मंत्रा शुकदेव को प्राप्त हुआ ।
अधिक जानकारी के लिए देखिए साधना चैनल शाम को 7:30 बजे

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